उत्तर प्रदेशकृषिलखीमपुर खीरी

लखीमपुर-खीरी।जनवरी में गेहूँ और सरसों में करें ये जरूरी काम, उपज बढ़ेगी 20% तक।

लखीमपुर-खीरी।जनवरी में गेहूँ और सरसों में करें ये जरूरी काम, उपज बढ़ेगी 20% तक।

लखीमपुर-खीरी।जनवरी में गेहूँ और सरसों में करें ये जरूरी काम, उपज बढ़ेगी 20% तक

रबी सीजन की मुख्य फसलें—गेहूँ और सरसों—दिसंबर और जनवरी के महीनों में तेजी से बढ़ती और विकसित होती हैं। यह समय फसलों की पोषण आवश्यकता, सिंचाई, रोग-कीट प्रबंलखीमपुर-खीरी।जनवरी में गेहूँ और सरसों में धन और दाना बनने की क्षमता के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि किसान इस अवधि में कुछ वैज्ञानिक तरीके अपनाएँ, तो उपज 15–20% तक बढ़ाना बिल्कुल संभव है।

 

 

ब्लॉक मितौली, ग्रामसभा अबगवाँ (मैनपुर) के रहने वाले पुष्पेन्द्र मिश्रा, जो वर्तमान में पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में शोधकार्यरत हैं, बताते हैं कि इस समय में की गई हर एक सिंचाई, पोषक तत्व प्रबंधन और बीमारी नियंत्रण का सीधा प्रभाव उपज पर पड़ता है। वे कहते हैं कि “दिसंबर–जनवरी की ठंड फसलों के लिए चुनौती और अवसर दोनों है—यदि किसान सही कदम उठाएँ तो फसल की बढ़वार और दाना भराव उत्कृष्ट हो सकता है।”

गेहूँ की बात करें तो दिसंबर में यह टिलरिंग अवस्था में होता है। इस समय बुवाई के 20–25 दिन बाद पहली सिंचाई और 45–50 दिन पर गाँठ बनने की अवस्था में दूसरी सिंचाई अत्यंत लाभकारी होती है। इन सिंचाइयों के साथ नाइट्रोजन की दूसरी और तीसरी किस्त देने से पौधों की वृद्धि तेजी से होती है। साथ ही 0.5% जिंक सल्फेट, 0.5% फेरस सल्फेट और 1% मैग्नीशियम सल्फेट का छिड़काव पत्तियों की हरियाली और दाना भराव को मजबूत बनाता है। गेरूआ रोग की स्थिति में समय पर फफूंदनाशी का छिड़काव अत्यंत आवश्यक है।

सरसों की फसल 30–35 दिन पर रोसेट अवस्था में पहली सिंचाई मांगती है। फूल आने से ठीक पहले 0.2% बोरेक्स और जिंक सल्फेट का छिड़काव फली झड़ने को कम करता है, जबकि गंधक पौधे में तेल मात्रा बढ़ाने में सहायक होती है। जनवरी में माहू का प्रकोप बढ़ता है, इसलिए नियमित निगरानी और आवश्यकतानुसार जैव या रासायनिक नियंत्रण जरूरी है। फली बनने के समय हल्की सिंचाई दाना भराव सुधारती है।

गेहूँ में किए जाने वाले मुख्य कार्य

1. टिलरिंग अवधि में विशेष ध्यान (20–40 दिन)

यह गेहूँ की उपज निर्धारण का सबसे महत्वपूर्ण समय है।

देर से सिंचाई या पोषक तत्वों की कमी टिलर संख्या को कम कर देती है।

2. पहली व दूसरी सिंचाई सही समय पर

पहली सिंचाई: बुवाई के 20–25 दिन बाद।

दूसरी सिंचाई: 45–50 दिन पर गाँठ बनने (G-node) की अवस्था में।

यह सिंचाई दाना संख्या बढ़ाती है, इसलिए कभी न छोड़ें।

3. नाइट्रोजन प्रबंधन

पहली सिंचाई के साथ नाइट्रोजन की दूसरी किस्त अवश्य दें।

तीसरी किस्त 50–55 दिन पर, यदि पानी उपलब्ध हो।

4. माइक्रो न्यूट्रिएंट स्प्रे

जिंक (Zn): 0.5% जिंक सल्फेट + 0.25% चूना

आयरन (Fe): 0.5% फेरस सल्फेट

मैग्नीशियम (Mg): 1% MgSO₄

इनसे पत्तियाँ हरी रहती हैं और दाना भराव बेहतर होता है।

5. रोग–कीट प्रबंधन

ठंड बढ़ने पर पीला व भूरा गेरुआ रोग तेजी से फैलता है।

शुरुआती अवस्था में सुरक्षित फफूंदनाशी का छिड़काव करें।

 

सरसों में किए जाने वाले मुख्य कार्य

1. रोसेट अवस्था में पहली सिंचाई (30–35 दिन)

यह सिंचाई शाखाओं के विकास और फूलों की संख्या बढ़ाती है।

जलभराव से बचें, वरना जड़ सड़न हो सकती है।

2. फूल आने से पहले माइक्रो न्यूट्रिएंट स्प्रे

गंधक (Sulphur): 20–25 किग्रा/हेक्टेयर यदि बेसल में न दिया हो।

बोरॉन (B): 0.2% बोरेक्स का स्प्रे — फली झड़ना कम होता है।

जिंक (Zn): 0.5% ZnSO₄ + 0.25% चूना।

3. माहू की निगरानी जरूरी

जनवरी में माहू (Aphid) का प्रकोप तेज होता है।

नीम-आधारित जैव उत्पाद पहले उपयोग करें,

आवश्यकता होने पर अनुशंसित कीटनाशी छिड़कें।

4. फली बनते समय हल्की सिंचाई

60–70 दिन पर दाना भराव के समय हल्का पानी देने से उपज बढ़ती है।

 

 

 

किसानों के लिए सलाह

दिसंबर–जनवरी की ठंड में फसल की नमी और पोषण संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इसी समय गेहूँ और सरसों दोनों में वृद्धि एवं दाना भराव की प्रक्रिया तेज होती है। खेत में हल्की नमी बनाए रखने से पौधे ठंड का सामना बेहतर ढंग से कर पाते हैं और पोषक तत्वों का अवशोषण भी सुचारु रहता है।

सूक्ष्म पोषक तत्व—जिंक, बोरॉन, गंधक और मैग्नीशियम—फसलों की गुणवत्ता और उपज निर्धारण में अहम भूमिका निभाते हैं। इनका संतुलित छिड़काव पौधों में हरियाली, फूल–फली की संख्या और दाना बनने की क्षमता को बढ़ाता है। विशेषकर सरसों में बोरॉन और गंधक तथा गेहूँ में जिंक और मैग्नीशियम अत्यधिक लाभकारी सिद्ध होते हैं।

साथ ही, खेत में खरपतवार, माहू, गेरूआ और अन्य कीट–रोगों की नियमित निगरानी करना जरूरी है। ध्यान रखें—समय पर की गई एक सिंचाई, एक स्प्रे या एक निराई पूरे मौसम की उपज में महत्वपूर्ण अंतर ला सकती है। किसान यदि इन बातों का पालन करें, तो फसल की पैदावार और गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

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